हिन्दू साम्राज्य “हिन्दू साम्राज्यदिनोत्सव’ आज (रविवार को)

जयपुरए 31 मई। छत्रपति शिवाजी का राज्यभिषेक दिवस हर्षोल्लास से ष्हिन्दू साम्राज्यदिनोत्सवश् के रूप में मनाया जाएगा। इस अवसर पर विभिन्न संगठनों की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मरणकिया जाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से जयपुर के तीस नगरों में हिन्दू साम्राज्यदिनोत्सव मनाया जाएगा।

गौरतलब है कि सन् 1630 के ष्आनन्द नामश् संवत्सर की ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के शुभ पर्व पर हिन्दू विजययुग के नवप्रवर्तक छत्रपति श्री शिवाजी महाराज ने स्वतंत्र सम्राट के रूप में सिंहासनारोहण किया था।

चौदह वर्ष की बाल्यावस्था में ही शिवाजी ने अपने एक मित्र दादाजी नरसप्रभु देशपांडे को लिखे अपने पत्र में लिखा था कि ष्हमने तो रोहिड़ेश्वर के सामने ष्हिन्दवी स्वराज्यश् की स्थापना की शपथ ग्रहण की है। यह शपथ सफल होए यह स्वयंभगवान की इच्छा है।श्

आगे चलकर शिवाजी के इस स्वप्न को साकार करने हेतु एक के बाद एक हिन्दू पदपादशाही के महाप्रतापीए वीरए योद्धा आगे बढ़ते रहेए जिन्होंने मुगलों के दिल्ली सिंहासन को चूर.चूर करके वहां के बादशाह को निवृत्ति वेतन देकर बैठा दिया था।आठ सौ वर्षों से अपनी इस हिन्दू भूमि में इस्लाम की पताका फहराने के लिए सब प्रकार से नृशंस.अत्याचारी शासन करने वाले आक्रमणकारियों को उनकी ध्वजा के साथ.साथ उनके स्वप्नों को भी सदा के लिए दफन कर दिया। समूचे हिन्दुस्थानमेंए दक्षिण और बंगाल में अपने अंतिम क्षण गिनने वाले कुछ छोटे.छोटे इस्लामी रजवाड़ों को छोड़करए पूरा देश इस्लामी दासता से मुक्त हो गया। मोहम्मद अली ने भी कहा था किए ष्पूरी दुनिया में अजेय बनकर आगे बढ़ने वाला इस्लामी बेड़ाआखिर में गंगा के तट पर आकर डूब गया।श् हिन्दुस्थान के निष्पक्ष इतिहासकारों का भी यही निर्विवाद मत रहा है कि अंग्रेजों द्वारा भारत पर कब्जा करने के लिए हुए निर्णायक युद्ध हिन्दुओं के साथ ही हुए तथा आन्तरिक टकराव और बिखरावके कारण हिन्दू शक्तियां अंग्रेजों के सामने परास्त हो गईं।

लेकिन इस तथ्य के प्रति अपने देश के सत्यनिष्ठ इतिहास को तोड़ने.मरोड़ने का एक कुत्सित प्रयास भी उजागर होता है। वह यह है कि ष्हिन्दू सदैव मार खाने वालेए भीरू तथा गुलामवृत्ति के रहे हैंए इसलिए वे इस्लामी आक्रमणकारियों के सामनेभी आखिर तक हारते ही रहे।श् परन्तु वास्तव में उत्तर में पंजाब से लेकर दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य तक बार.बार मुस्लिम आक्रांताओं को धूल चटाने वाले हिन्दू ही थे। असम में तो उनका पांव रखना भी संभव नहीं हुआ। बाद में हिन्दू रणबांकुरोंने शिवाजी द्वारा प्रज्ज्वलित किए गए भारतीय स्वातंत्र्य संघर्ष के यज्ञकुण्ड में दिल्ली की इस्लामी सत्ता के ह्मदय के टुकड़े.टुकड़े करके अंतिम आहुति के रूप में डाल दिए। यही सच्चे इतिहास का जीवंत साक्षी है।

छत्रपति शिवाजी द्वारा स्थापित किए गए हिन्दवी स्वराज्य में केवल दो.चार जिले ही थेए जो धर्मवीर सम्भाजी की मृत्यु के पश्चात् पराक्रांत हो गए। हिन्दवी स्वराज्य के अधिपति राजाराम को कर्नाटक की एक अप्रतिमए शूर महिला केलदिचेन्नम्मा के संरक्षण में आश्रय लेना पड़ा। एक किला भी हिन्दुओं के हाथ में नहीं बचा थाए पर एक.एक गांवए एक.एक घर गढ़ बन चुका था। हर घरए गांव से स्वातंत्र्य वीर रण में उतर आए। देखते ही देखते वे शिवाजी के हिन्दवी स्वराज के स्वप्नको साकार करते हुए कृष्णाएनर्मदाए यमुना के तट को पार करके दिल्ली तक पहुंच गए। एक वीर ने तो काबुल जाकर भगवा पताका फहराई। हिमालय से कन्याकुमारी तक पूरा हिन्दुस्थान अक्षरशरू हिन्दुओं का स्थान बन गया।

विश्व के इतिहास में ऐसा अलौकिक चमत्कार कैसे घटित हुआघ् शिवाजी के कार्य में ऐसी कौन सी अदम्य चेतना भरी थी कि जिसके कारण सभी प्रकार के संकट और चुनौतियों की चट्टानों को चकनाचूर करते हुए हिन्दू विजयपताका आगे बढ़तीरहीघ् पहली बात. प्रत्येक हिन्दू.ह्मदय में छिपी हिन्दुत्व की चिंगारी को शिवाजी ने प्रज्ज्वलित किया। दूसरी बात.आहत हिन्दू मन में विजिगीषु प्रवृत्ति को जगाया और स्वयं के परम साहसी एवं कुशल रणकौशल के बल पर विजय का दुर्दम्यआत्मविश्वास उनमें भर दिया।